HOME|hi|sahitya|song|sumitra|gramya|
सुमित्रानंदन पंत धोबियों का नृत्य सुमित्रानंदन पंत ग्राम श्री
सुमित्रानंदन पंत - ग्राम वधू


ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।



3
ग्राम वधू

जाती ग्राम वधू पति के घर !

मा से मिल, गोदी पर सिर धर,

गा गा बिटिया रोती जी भर,

जन जन का मन करुणा कातर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

भीड़ लग गई लो, स्टेशन पर,

सुन यात्री ऊँचा रोदन स्वर

झाँक रहे खिड़की से बाहर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

चिन्तातुर सब, कौन गया अम्र,

पहियों सेदब, कट पटरी पर,

पुलिस कर रही कहीं पकड़-धर?

जाती ग्राम वधु पति के घर ?

मिलती ताई से गा रोकर,

मौसी से वह आपा खोकर,

बारी-बारी रो, चुप होकर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

बिदा फुफा से ले हाहाकर,

सखियों से रो धो बतिया कर,

पड़ोसिनों पर टूट, रँभा कर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

मा कहती,- रखना सँभाल घर,

मौसी, - धनि, लाना गोदी भर,

सखियाँ, - जाना हमें मत विसर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

नहीं आँसुओं से आँचल तर,

जन बिछोह से ह्रदय न कातर,

रोती वह, रोने का अवसर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

लो, अब गाड़ी चल दी भर भर,

बतलाती धनि पति से हँस कर,

सुस्थिर डिब्बे के नारी नर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

रोना गाना यहां चलन भर !

आता उसमें उभर न अंतर,

रूढ़ि यंत्र जन जीवन परिकर,

जाती ग्राम वधू पति के घर !

Translation - भाषांतर

N/A
3
References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

जनवरी' ४०


Created by TransLiteral/ Courtsey {Khapre.org} on 2008-02-14T01:24:02.0949792-05:00

Comments | अभिप्राय

Please join {Khapre.org} Group on facebook and to write on to our wall, participate in group discussions..

Connect to us