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सुमित्रानंदन पंत खिड़की से सुमित्रानंदन पंत दिवा स्वप्न
सुमित्रानंदन पंत - रेखाचित्र


ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।



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रेखाचित्र

चाँदी की चौड़ी रेती

फिर स्वर्णिम गंगा धारा,

जिसके निश्चल उर पर विजड़ित

रत्‍न छाय नभ सारा !

फिर बालू का नासा

लम्बा ग्राह तुंड सा फैला,

छितरी जल रेखा-

कछार फिर गया दूर तक मैला !

जिस पर मछुओं की मँड़ई,

औ तरबूजों के ऊपर,

बीच बीच में, सरपत के मूँठे

खग-से खोले पर !

पीछे, चित्रित विटप पाँति

लहराई सांध्य क्षितिज पर

जिससे सट कर

नील धूम्र रेखा ज्यों खिची समांतर ।

बर्ह पुच्छ-से जलद पंख

अंबर में बिखरे सुंदर

रंग रंग की हलकी गहरी

छायाएँ छिटका कर ।

सब से ऊपर निर्जन नभ में

अपलक संध्या तारा,

नीरव औ निःसंग,

खोजता सा कुछ, चिर पथहारा !

साँझ, - नदी का सुना तट,

मिलता है नही किनारा,

खोज रहा एकाकी जीवन

साथी, स्नेह सहारा !

Translation - भाषांतर

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References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

जनवरी' ४०


Created by TransLiteral/ Courtsey {Khapre.org} on 2008-02-14T01:41:56.9205024-05:00

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