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सुमित्रानंदन पंत - सौन्दर्य कला


ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।



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सौन्दर्य कला

नव वसंत की रूप राशि का ऋतु उत्सव यह उपवन,

सोच रहा हूँ, जन जग से क्या सचमुच लगता शोभन !

या यह केवल प्रतिक्रिया, जो वर्गो के संस्कृत जन

मन में जागृत करते, कुसुमित अंग, कंटकावृत मन !

रंग रंग के खिले फ्लाँक्स, वरवीना, छपे डियांथस,

नत दृग ऐटिह्लिनम, तितली सी पेंजी, पापी सालस;

हँसमुख कैडीटफ्ट, रेशमी चटकीले नैशटरशम,

खिली स्वीट पी, - एवंडस, फिल बास्केट औ ब्लू बैंटम ।

दुहरे कार्नेशस, स्वीट सुलतान सहज रोमांचित,

ऊँचे हाँली हाँक, लार्कस्पर पुष्प स्तंभ से शोभित ।

फूले बहु मखमली, रेशमी, मृदुल गुलाबी के दल,

धवल मिसेज एंड्र कार्नेगी ब्रिटिश क्वीन हिम उज्वल ।

जोसेफ हिल, सनबर्स्ट पीत, स्वर्णिम लेडी हेलिंडन,

ग्रेंड मुगल, रिचमंड, विकच ब्लैक प्रिंस नील लोहित तन ।

फेग्ररी क्वीन, मारगेरेट मृदु वीलियम शीन चिर पाटल,

बटन रोज बहु लाल, ताम्र माखनी रंग के कोमल ।

विविध आयताकार, वर्ग षट्‌कोण क्यारियाँ सुषमित,

वर्तुल, अंडाकृति, नव रुचि से कटी छँटी, दूर्वावृत ।

चित्रित-से उपवन में शत रंगो में आतप-छाया,

सुरभि श्वसित मारुत, पुलकित कुसुमों की कंपित काया ।

नव वसंत की श्री शोभा का दर्पण सा यह उपवन,

सोच रहा हूँ, क्या विवर्ण जन जग से लगता शोभन !

इस मटमैली पृथ्वी ने सतरंगी रवि किरणों से

खींच लिए किस माया बल से सब रँग आभरणों-से !

युग युग से किन सूक्ष्म बीज कोषों से विकसित होकर

राशि राशि ये रूप रंग भू पर हो रहे निछावर !

जीवन ये भर सके नही मृन्मय तन में धरती के,

सुंदरता के सब प्रयोग लग रहे प्रकृति के फीके !

जग विकास क्रम में सुंदरता कब की हुई पराजित,

तितली, पक्षी, पुष्प वर्ग इसके प्रमाण है जीवित ।

ह्रदय नही इस सुंदरता के, भावोन्मेष न मन में,

अंगो का उल्लास न चिर रहता, कुम्हलाता क्षण में !

हुआ सृष्टि में बद्ध ह्रदय जीवों का तभी पदार्पण,

जड़ सुंदरता को निसर्ग कर सका न आत्म समर्पण,

मानव उर में भर ममत्व जीवों के जीवन के प्रति

चिर विकास प्रिय प्रकृति देखती तब से मानव परिणीत ।

आज मानवी संस्कृतियाँ है वर्ग चयन से पीड़ित,

पुष्प पक्षियों सी वे अपने ही विकास में सीमित ।

इस विशाल जन जीवन के जग से हो जाति विभाजित

व्यापक मनुष्यत्व से वे सब आज हो रही वंचित !

ह्रदय हीन, अस्तित्व मुग्ध ये वर्गो के जन निश्‍चित,

वेश वसन भूषित बहु पुष्प-वनस्पतियों-से शोभित !

हुआ कभी सौन्दर्य कला युग अंत प्रकृति जीवन में,

मानव जग से जाने को वह अब युग परिवर्तन में ।

ह्रदय, प्रेम के पूर्ण ह्रदय से निखिल प्रकृति जग शासित,

जीव प्रेम के सन्मुख रे जीवन सौन्दर्य पराजित !

नव वसंत की वर्ग कला का दर्शन गृह यह उपवन,

सोच रहा हूँ विश्री जन जग से लगता क्या शोभन !

Translation - भाषांतर

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References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

फरवरी' ४०


Created by TransLiteral/ Courtsey {Khapre.org} on 2008-02-14T01:45:29.5262144-05:00

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