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सुमित्रानंदन पंत - कला के प्रति


ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।



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कला के प्रति

तुम भाव प्रवण हो ।

जीवन प्रिय हो, सहनशील, सह्रदय हो, कोमल मन हो ।

ग्राम तुम्हारा वास रूढ़ियों का गढ है चिर जर्जर,

उच्च वंश मर्यादा केवल स्वर्ण-रत्‍नप्रभ पिंजर ।

जीर्ण परिस्थितीयाँ ये तुम में आज हो रही बिम्बित,

सीमित होती जाती हो तुम, अपने ही में अवसित ।

तुम्हे तुम्हारा मधुर शील कर रहा अजान पराजित,

वृद्ध हो रही हो तुम प्रतिदिन, नही हो रही विकसित ।

नारी की सुंदरता पर मै होता नही विमोहित,

शोभा का ऐश्वर्य मुझे करता अवश्य आनंदित ।

विशद स्त्रीत्व का ही मै मन में करता हँ नित पूजन,

जब आभा देही नारी आह्लाद प्रेम कर वर्षण

मधुर मानवी की महिमा से भू को करती पावन ।

तुम में सब गुण है -तोड़ो अपने भय कल्पित बंधन,

जड़ समाज के कर्दम से उठकर सरोज सी ऊपर

अपने अंतर के विकास से जीवन के दल दो भर ।

सत्य नही बाहर नारी का सत्य तुम्हारे भीतर,

भीतर ही से करो नियंत्रित जीवन को, छोड़ो डर !

Translation - भाषांतर

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References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

दिसंबर' ३९


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